मैं यह सोच कर उस के दर से उठा था...

मैं ये सोच कर उस के दर से उठा था 
कि वो रोक लेगी मना लेगी मुझको 
हवाओं में लहराता आता था दामन 
कि दामन पकड़ के बिठा लेगी मुझको 
क़दम ऐसे अंदाज़ से उठ रहे थे 
की आवाज़ दे कर बुला लेगी मुझको 

मगर उसने रोका ना उसने मनाया 
ना दामन ही पकड़ा ना मुझको बिठाया 
ना आवाज़ ही दी ना वापस बुलाया 
मैं आहिस्ता आहिस्ता बढ़ता ही आया 
यहाँ तक कि उससे जुदा हो गया मैं 
यहाँ तक कि उससे जुदा हो गया मैं 

- कैफ़ी आज़मी 

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